मेरी सीमाएं सीमित हैं, मैं वीराने का डेरा हूँ,
मैं हूँ बंधन की डोर , मैं सूरज नहीं सवेरा हूँ ,
सखी मैं कैसे कहूँ कि तेरा हूँ।
परिभाषा का अपवाद हूँ मैं,
पिंजरे का ही आज़ाद हूँ मैं ,
अनसुनी एक फरियाद हूँ मैं,
हर तरह मात्र बर्बाद हूँ मैं,
तेरे नयनों में स्वप्न नए,
मैं बीती एक कहानी सा
उन्मुक्त गगन का पंछी तू ,
मैं गलियों की नादानी सा
मैं रातों के सन्नाटे में,
भटके हुए राही जैसा हूँ
मैं खुद का भी जब नहीं रहा
तो क्यों कहते हो कैसा हुँ
मैं स्वप्न सृजित बागों के तन पर
फैला हुआ अँधेरा हूँ,
सखी मैं कैसे कहु की तेरा हूँ।
मैं हूँ बंधन की डोर , मैं सूरज नहीं सवेरा हूँ ,
सखी मैं कैसे कहूँ कि तेरा हूँ।
परिभाषा का अपवाद हूँ मैं,
पिंजरे का ही आज़ाद हूँ मैं ,
अनसुनी एक फरियाद हूँ मैं,
हर तरह मात्र बर्बाद हूँ मैं,
तक़दीर मेरी घनघोर घटा,
अस्तित्व अँधेरे में सिमटा,
मानेगा कौन, सवेरा हूँ,
तेरे नयनों में स्वप्न नए,
मैं बीती एक कहानी सा
उन्मुक्त गगन का पंछी तू ,
मैं गलियों की नादानी सा
मैं रातों के सन्नाटे में,
भटके हुए राही जैसा हूँ
मैं खुद का भी जब नहीं रहा
तो क्यों कहते हो कैसा हुँ
मैं स्वप्न सृजित बागों के तन पर
फैला हुआ अँधेरा हूँ,
सखी मैं कैसे कहु की तेरा हूँ।
- महेन्द्र प्रताप सिंह
