जीवन कब शुरू हुआ यह तो ज्ञात नहीं लेकिन जब हीच संभाला तो पाया कि जमींदार घराना था कभी हमारे पूर्वज इस इलाके के राजा या सामंत हुआ करते थे। परंतु पिता की मात्र पाँच साल की आयु में ही वह अनाथ हो चुके थे। मैंने भी कुछ इस तरह ही जीवन का आभास किया कि मेरे पिता की पहली पत्नी यानि की हमारी माँ गुजर चुकी थी और हम सिर्फ हमारी दूसरी माँ को ही जानते थे। वह हमारे पिता से शायद 10 या 15 साल छोटी थीं। अब कौन सगा या कौन सौतेला बस सारे के सारे भाई बहन सगे की तरह ही रहे। हमें अतीत का कुछ भी ज्ञात नहीं था। पिता जी कभी कभी अपनी कहानी सुनाते थे कि उनकी भी 3 माताएं थी। और जब वह पाँच साल के हुए थे तो उनके सिर पर माँ बाप का साया नहीं रहा था। पिता ने जमींदारी व सामंती के अधिकारों के तहत होश संभालते ही काफी ज़मीन का अधिकार हासिल किया अदालत के माध्यम से और हमारा बचपन एक प्रतिष्ठित परिवार के सदस्य के रूप मैं उदय हुआ।
पिता सरकारी अध्यापक थे, उनके बड़े भाई फ़ौज में अच्छे पद पर थे और उनके सबसे बड़े भाई अविवाहित और फक्कड थे उन्होंने शादी नहीं की थी। छोटे ताऊ जी के भी कोई संतान नहीं थी थी। कुल मिला कर हम लोग ही 4 भाई थे अपने पिता की संतान जिन्हें कुल् का चिराग लेकर आगे बढ़ना था।
