Sunday, May 1, 2022

जीवन एक संघर्ष

जीवन कब शुरू हुआ यह तो ज्ञात नहीं लेकिन जब हीच संभाला तो पाया कि जमींदार घराना था कभी हमारे पूर्वज इस इलाके के राजा या सामंत हुआ करते थे। परंतु पिता की मात्र पाँच साल की आयु में ही वह अनाथ हो चुके थे। मैंने भी कुछ इस तरह ही जीवन का आभास किया कि मेरे पिता की पहली पत्नी यानि की हमारी माँ गुजर चुकी थी और हम सिर्फ हमारी दूसरी माँ को ही जानते थे। वह हमारे पिता से शायद 10 या 15 साल छोटी थीं। अब कौन सगा या कौन सौतेला बस सारे के सारे भाई बहन सगे की तरह ही रहे। हमें अतीत का कुछ भी ज्ञात नहीं था। पिता जी कभी कभी अपनी कहानी सुनाते थे कि उनकी भी 3 माताएं थी। और जब वह पाँच साल के हुए थे तो उनके सिर पर माँ बाप का साया नहीं रहा था। पिता ने जमींदारी व सामंती के अधिकारों के तहत होश संभालते ही काफी ज़मीन का अधिकार हासिल किया अदालत के माध्यम से और हमारा बचपन एक प्रतिष्ठित परिवार के सदस्य के रूप मैं उदय हुआ।

पिता सरकारी अध्यापक थे, उनके बड़े भाई फ़ौज में अच्छे पद पर थे और उनके सबसे बड़े भाई अविवाहित और फक्कड थे उन्होंने शादी नहीं की थी। छोटे ताऊ जी के भी कोई संतान नहीं थी थी। कुल मिला कर हम लोग ही 4 भाई थे अपने पिता की संतान जिन्हें कुल् का चिराग लेकर आगे बढ़ना था।



Thursday, June 9, 2016

प्रतीक्षा

उजाला प्रतीक्षा, कुहासा प्रतीक्षा।

आशा प्रतीक्षा, अभिलाषा प्रतीक्षा।
जीवन की हर परिभाषा प्रतीक्षा।

शाम प्रतीक्षा, प्रकाश प्रतीक्षा।
सांस प्रतीक्षा, आश प्रतीक्षा।

हार गए तो जीत प्रतीक्षा।
खो जाए तो मीत प्रतीक्षा।

बिछुड़ गए तो मिलन  प्रतीक्षा।
चला गया तो आगमन  प्रतीक्षा।

शायद ये पूरा जीवन प्रतीक्षा।





Thursday, May 22, 2014

सखी मैं कैसे कहूँ कि तेरा हूँ।

मेरी सीमाएं सीमित हैं, मैं वीराने का डेरा हूँ,  
मैं हूँ बंधन की डोर , मैं सूरज नहीं सवेरा हूँ ,

सखी मैं कैसे कहूँ कि तेरा हूँ। 

परिभाषा का अपवाद हूँ मैं,
पिंजरे का ही  आज़ाद हूँ मैं ,
अनसुनी एक फरियाद हूँ मैं,
हर तरह मात्र  बर्बाद हूँ मैं,


तक़दीर मेरी घनघोर घटा, 
अस्तित्व अँधेरे में सिमटा, 
मानेगा कौन, सवेरा हूँ,
सखी मैं कैसे कहूँ कि तेरा हुँ। 

तेरे नयनों में स्वप्न नए,
मैं बीती एक कहानी सा 
उन्मुक्त गगन का  पंछी तू ,
मैं गलियों की नादानी सा 

मैं रातों  के सन्नाटे में,
भटके हुए  राही जैसा हूँ 
मैं खुद का भी जब नहीं रहा 
तो क्यों कहते हो कैसा हुँ
मैं स्वप्न सृजित बागों के तन पर 
फैला हुआ अँधेरा हूँ,
सखी मैं कैसे कहु की तेरा हूँ। 
                                    - महेन्द्र  प्रताप सिंह